सम्भव है -
किसी दिन कुछ भी शेष ना रहे
ना मेरी स्मृतियाँ
ना मेरा एकाकीपन
ना मेरी पुस्तकें
ना मेरी लम्बी उबाऊ यात्रायें
ना मेरी थकी हुई जीवन-चर्या
सम्भव है -
तब भी शेष रहें
तुम्हारी प्रतीक्षा
तुम्हारी खिलखिलाहट
तुम्हारी जीवन्तता
तुम्हारे परोक्ष आँसू।
संभव है -
जब अतीत हमें बार-बार आहटें देकर अपनी ओर खींचे
फ़िर से उतरून गहराईयों में
फ़िर से डूबूं पुराने कलापों में
फ़िर से कुरेदूँ अपनी कविता को
फ़िर से उभारून एक नई दृष्टि
फ़िर से बिछाऊँ अपना जाल
सम्भव है -
स्वार्थ फ़िर से मुझ पर हावी हो
अंतर्द्वन्द्व फ़िर भी बाकी हो
चिमनियों का धुंआ और भी गहरा हो
अनिश्चय की आशंका व्यग्रता को बढाए
नियति अपना पाश फ़िर से फैला दे
सम्भव है।
गुरुवार, 24 जुलाई 2008
गुरुवार, 18 अक्टूबर 2007
राह अजानी
राह अजानी चल ना पाया
अपने मन की सुन ना पाया
चुनता रहा मोतियां हरदम
मन की तृषा बुझा ना पाया
प्रेयस-श्रेयस सभी एक थे
भ्रम-संभ्रम भी नहीं शेष थे
राह प्रशस्त दृष्टि भी उज्जवल
मन का द्वंद्व प्रबलतर किन्तु
मोह बन्ध से छुट ना पाया
राह अजानी चल ना पाया
अपने मन की सुन ना पाया ........
श्वेत-श्याम का व्यर्थ भेद अब
संकुचित दृष्टि बस यही खेद अब
देखी जानी भोगी पीड़ा
संत्राष-ज्ञान से जुड़ कर भी मैं
मार्ग मुक्ति का चुन ना पाया
राह अजानी चल ना पाया
अपने मन की सुन ना पाया .........
अपने मन की सुन ना पाया
चुनता रहा मोतियां हरदम
मन की तृषा बुझा ना पाया
प्रेयस-श्रेयस सभी एक थे
भ्रम-संभ्रम भी नहीं शेष थे
राह प्रशस्त दृष्टि भी उज्जवल
मन का द्वंद्व प्रबलतर किन्तु
मोह बन्ध से छुट ना पाया
राह अजानी चल ना पाया
अपने मन की सुन ना पाया ........
श्वेत-श्याम का व्यर्थ भेद अब
संकुचित दृष्टि बस यही खेद अब
देखी जानी भोगी पीड़ा
संत्राष-ज्ञान से जुड़ कर भी मैं
मार्ग मुक्ति का चुन ना पाया
राह अजानी चल ना पाया
अपने मन की सुन ना पाया .........
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