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बुधवार, 30 सितंबर 2009

मेरे डर

मुझे डर है कि
किसी रोज सूरज मांग लेगा
हिसाब अब तक कि अपनी तमाम रोशनी का
पहाड़ मांगेंगे हिसाब सारी बारिश का
हवाएं हमारे वजूद का
नदियाँ हमारी ज़िन्दगी का
और ज़िन्दगी मेरी सारी मुस्कुराहटों का।

मुझे डर है कि
जब हादसों कि फेहरिस्त में एक नाम मेरा भी होगा
ज़िन्दगी कि उथल पुथल में
कहीं खो जाने कि कोशिश में
तुम्हें भूलने कि कोशिशें नाकाम होंगी
मेरे चाहने वाले फ़िर भी हसेंगे मेरी नादानी पर
मैं गंभीरता का मुखौटा ओढ़ चुप रह लूँगा।

मुझे डर है
उस दिन मैं अकेला रह जाऊंगा
वो शायद मेरी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत दिन ना हो
मेरी तमाम नाकामियां जिनमे तुम भी एक हो,
मेरा मुंह चिढाती रहेंगी
मेरी आत्म-मुग्धता मेरा साथ छोड़ दे शायद
तब वो सारी यादें मुझे और भी उदास कर देंगी।
और तब
मेरी तमाम आशंकाएं सच हो जाएँगी
वो तमाम भूले रास्ते मेरा पता पूछेंगे
मेरा भींगा तकिया - मेरी लाल आंखों का सच उगल देगा

मैं डरता हूँ
इतना सब कुछ होने के बाद भी समय हमारे बीच कि दूरी बढ़ा देगा
जीवन का उत्साह ठंढा पड़ जाएगा
बुढापा तब सिर्फ़ उमर ही नहीं
ज़िन्दगी के बीत जाने का भी नाम होगा।
मैं सचमुच डरता हूँ।


गुरुवार, 24 जुलाई 2008

सम्भव है!

सम्भव है -
किसी दिन कुछ भी शेष ना रहे
ना मेरी स्मृतियाँ
ना मेरा एकाकीपन
ना मेरी पुस्तकें
ना मेरी लम्बी उबाऊ यात्रायें
ना मेरी थकी हुई जीवन-चर्या

सम्भव है -
तब भी शेष रहें
तुम्हारी प्रतीक्षा
तुम्हारी खिलखिलाहट
तुम्हारी जीवन्तता
तुम्हारे परोक्ष आँसू।

संभव है -
जब अतीत हमें बार-बार आहटें देकर अपनी ओर खींचे
फ़िर से उतरून गहराईयों में
फ़िर से डूबूं पुराने कलापों में

फ़िर से कुरेदूँ अपनी कविता को
फ़िर से उभारून एक नई दृष्टि
फ़िर से बिछाऊँ अपना जाल


सम्भव है -
स्वार्थ फ़िर से मुझ पर हावी हो
अंतर्द्वन्द्व फ़िर भी बाकी हो
चिमनियों का धुंआ और भी गहरा हो
अनिश्चय की आशंका व्यग्रता को बढाए
नियति अपना पाश फ़िर से फैला दे
सम्भव है।