सोमवार, 16 अप्रैल 2012

परतें


शायद तुम्हें याद भी ना हो -
वो पहली परत, 
अनायास ही जो चिपका दी गयी थी
तुम्हारे चेहरे पर
और  जिसे अपना सच मान लिया था तुमने
तब-से अब तक
जाने कितनी ही परतें
तुमने खुद ही चिपका ली,
या चिपक जाने दिया
दोस्तों - साथियों - दुश्मनों के हाथों -
अपनी सुविधा के मुताबिक.
और जीते रहे उस हर एक झूठ को
छुपा लिया खुद को उन परतों के पीछे
महफूज़ मान कर.
और अब रोज सुबह जो शख्स आईने में तुम्हारे सामने होता है
वो तुम्हारा अक्स नहीं है,
वो समुच्चय है उन तमाम परतों का,
उससे भला कैसी उम्मीद?
अब तो तुम्हें डरना चाहिए - उस शख्स से
जो परतों के हटने के बाद तुम्हारे सामने होगा -
पहचान पाओगे उसे?

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

ख्वाहिशें: दो कवितायेँ

(१)
उम्मीद के परे अस्तित्व रखतीं
ज़िन्दगी के परे पाँव फैलातीं
अपनी गुरुता का बोझ डाले
हमारे जीवन का हिस्सा बनते हुए
सब्र की मेड़ों से खिलवाड़ करती हैं;
आँखों को बार बार खोलती हैं
ऊर्जा दे जाती हैं जीने का
कभी दिख कर
कभी आस पास आकर - सहला जाती हैं
और जगा जाती हैं - ख्वाहिशें!!

(२)
गूंजती हैं सपनों में
बेचैन करती हैं नींदों में
खुली आँखों में बहकाती हैं
बेमतलब की योजनायें बनवाती
अंतर्द्वंद बढाती हैं
मुस्कुराती हैं - लज्जित भी करती हैं
हमारी लघुता को उजागर कर
बहलाती हैं - गुनगुनाती हैं
काश कभी खामोश हो पाती - ख्वाहिशें!!