बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

ग़ज़ल

बात बना के रात बिता के, भोर हुई अनजानी सी;
हमने अपनी आँखें खोलीं - ठान लिया मनमानी की।

कोई आगे पीछे होता, तो शायद चिंता होती
अपनी राह अकेले की थी- मौज-ए-दरिया रवानी की।

ऐसा तो अक्सर होता है - लोग तो ताने मारेंगे,
परवाह भला क्यों - जीवन आनी-जानी की।

आपको देखा आपको चाहा, आपसे बातें करते हैं,
सांझ ढलेगी घर लौटेंगे - क्यों सोचें रोटी पानी की।

लोगों ने कितना समझाया लेकिन हम भी जिद्दी थे,
घर का छप्पर फूंका हमने, क्यों ऐसी नादानी की।

राह में कांटे धुप मिलेंगी, बारिश भी तन्हाई भी -
अपना क्या खोना-क्या पाना, बातें खूब कहानी की।

बुधवार, 30 सितंबर 2009

मेरे डर

मुझे डर है कि
किसी रोज सूरज मांग लेगा
हिसाब अब तक कि अपनी तमाम रोशनी का
पहाड़ मांगेंगे हिसाब सारी बारिश का
हवाएं हमारे वजूद का
नदियाँ हमारी ज़िन्दगी का
और ज़िन्दगी मेरी सारी मुस्कुराहटों का।

मुझे डर है कि
जब हादसों कि फेहरिस्त में एक नाम मेरा भी होगा
ज़िन्दगी कि उथल पुथल में
कहीं खो जाने कि कोशिश में
तुम्हें भूलने कि कोशिशें नाकाम होंगी
मेरे चाहने वाले फ़िर भी हसेंगे मेरी नादानी पर
मैं गंभीरता का मुखौटा ओढ़ चुप रह लूँगा।

मुझे डर है
उस दिन मैं अकेला रह जाऊंगा
वो शायद मेरी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत दिन ना हो
मेरी तमाम नाकामियां जिनमे तुम भी एक हो,
मेरा मुंह चिढाती रहेंगी
मेरी आत्म-मुग्धता मेरा साथ छोड़ दे शायद
तब वो सारी यादें मुझे और भी उदास कर देंगी।
और तब
मेरी तमाम आशंकाएं सच हो जाएँगी
वो तमाम भूले रास्ते मेरा पता पूछेंगे
मेरा भींगा तकिया - मेरी लाल आंखों का सच उगल देगा

मैं डरता हूँ
इतना सब कुछ होने के बाद भी समय हमारे बीच कि दूरी बढ़ा देगा
जीवन का उत्साह ठंढा पड़ जाएगा
बुढापा तब सिर्फ़ उमर ही नहीं
ज़िन्दगी के बीत जाने का भी नाम होगा।
मैं सचमुच डरता हूँ।