सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

बहुत कुछ शेष है

कितनी ही कहानियां  - जो कहनी हैं, सुननी हैं
कितनी उम्मीदें - खुद से, औरों से
कितनी ही ख्वाहिशें और ढेर सारे रास्ते
ढेरों यात्राएं और उनसे जुड़ा एकाकीपन
बहुत कुछ शेष है.

जो संवाद अधूरे हैं- पूरे करने हैं
कविताएं जो सिर्फ ज़ेहन में हैं - लिखी जानी हैं
पुस्तकें जो पढ़ी जानी थीं - आधी पढ़ कर रखी हैं
कई सारी बचपन की चिट्ठियां - अब भी लिखी जानी बाकी हैं
आशायें, सपने  - तमाम नाकामियों के बाद भी बची हुई हैं।

वो बातें जो सिर्फ सोची गईं  - वो तारीफ़ें वो शिक़ायतें
जो तुच्छ सी लगीं थीं
वो उम्मीदें - जो ज़िद से छोटी साबित हुईं
वो दुःख जो कमज़ोर तो कर गए, पर दूसरों से छुपा दिए गए
अब भी बचे हैं.

खुली आँखों वाले वो सारे सपने, अब भी टिके हैं
भटकाव के इस दौर में  - हिम्मत देती वो बातें
उलझन भरे इस वक़्त में - बचपन में पढ़ी गईं पतली किताबों की सीख़
कुछ बुनियादी भरोसे
कुछ अडिग ज़िद
और ढेर सारा समर्पण  -
कितना कुछ तो शेष है.    

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

परतें


शायद तुम्हें याद भी ना हो -
वो पहली परत, 
अनायास ही जो चिपका दी गयी थी
तुम्हारे चेहरे पर
और  जिसे अपना सच मान लिया था तुमने
तब-से अब तक
जाने कितनी ही परतें
तुमने खुद ही चिपका ली,
या चिपक जाने दिया
दोस्तों - साथियों - दुश्मनों के हाथों -
अपनी सुविधा के मुताबिक.
और जीते रहे उस हर एक झूठ को
छुपा लिया खुद को उन परतों के पीछे
महफूज़ मान कर.
और अब रोज सुबह जो शख्स आईने में तुम्हारे सामने होता है
वो तुम्हारा अक्स नहीं है,
वो समुच्चय है उन तमाम परतों का,
उससे भला कैसी उम्मीद?
अब तो तुम्हें डरना चाहिए - उस शख्स से
जो परतों के हटने के बाद तुम्हारे सामने होगा -
पहचान पाओगे उसे?