बुधवार, 28 जुलाई 2010

परिवर्तन - एक कविता

सब कुछ वैसा ही है -
धुप उतनी ही गरम है
शामें उमस भरी और हवा नम है
सडकों पर कारें, बसें और वाहन हैं
ट्राफिक लाइट है - और उनके उल्लंघन को आतुर ड्राईवर भी वैसे ही हैं
ऑफिस है - फाईलें हैं,
काम अब भी आखिरी मिनटों में ही ख़त्म होता है
उदास सुबहें और बेचैनी से भरे दिन हैं
शाम में खेल है - और थकावट में डूबने को आतुर तन है
जिम की निर्जीविता है - स्विम्मिंग की उमंग है
रात की उकताहट है और इन्टरनेट की आवारगी है
नींद की ख्वाहिश फिर भी बाकी है।
माँ से बातें करने की इच्छा है
कुछ पुराने दोस्तों से मिल पाने की उम्मीद अब भी बाकी है
परिवर्तन एक निरंतरता है -
सब कुछ वैसा ही है।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

ग़ज़ल

बात बना के रात बिता के, भोर हुई अनजानी सी;
हमने अपनी आँखें खोलीं - ठान लिया मनमानी की।

कोई आगे पीछे होता, तो शायद चिंता होती
अपनी राह अकेले की थी- मौज-ए-दरिया रवानी की।

ऐसा तो अक्सर होता है - लोग तो ताने मारेंगे,
परवाह भला क्यों - जीवन आनी-जानी की।

आपको देखा आपको चाहा, आपसे बातें करते हैं,
सांझ ढलेगी घर लौटेंगे - क्यों सोचें रोटी पानी की।

लोगों ने कितना समझाया लेकिन हम भी जिद्दी थे,
घर का छप्पर फूंका हमने, क्यों ऐसी नादानी की।

राह में कांटे धुप मिलेंगी, बारिश भी तन्हाई भी -
अपना क्या खोना-क्या पाना, बातें खूब कहानी की।